ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या जीवो ब्रह्मैव नापरः ||
यहाँ आये हुए "जगन्मिथ्या" वाक्यांश में मिथ्या का अर्थ झूठ (अभावस्वरूप ) नहीं है | शांकरवेदान्त में प्रकृति को भावरूप अज्ञान माना गया है , अभाव रूप नहीं || असत् का भाव (विद्यमान होना) नहीं होता और सत् का अभाव नहीं होता |
जगत सत्य होता तो इसका कभी बाध नहीं होता और असत्य होता तो इसकी कभी प्रतीति नहीं होती अतः सत्य तथा असत्य से विलक्षण अनिर्वचनीय कोटि की यह प्रकृति है , स्वयं परमात्मा की ही अचिन्त्य शक्ति जगत के रूप में भासित हो रही है | देवस्य शक्तिर्स्वगुणैर्निगूढाम् ||
|| जय श्री राम ||
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