शनिवार, 28 अक्टूबर 2017

रामनाम मनि दीप धरु

गौतम पटेल की किताब Friday, June 16, 2006 रामनाम मनि दीप धरु “ नाम मनि दीप धरु जीह देहरीं द्वार । तुलसी भीतर बाहरेहूँ जौं चाहसि उजियार ।।” – मानस, बालकाण्ड – 21. दोहावली – 6. संत शिरोमणि बाबा तुलसीदास जी लिखते हैं कि यदि तू भीतर और बाहर दोनों ओर उजाला चाहता है तो मुखरूपी द्वार की जीभरूपी देहली पर राम नाम रूपी मणि दीपक को रख । राम नाम मणि है । राम नाम परम श्रेष्ठ है । राम नाम परम योग्य है । यदि तू आंतरिक और बाह्य प्रभामण्डल को प्रकाशित करना चाहता है तो इसे जीभ के ऊपर रख, जीभ में धारण कर और जीभ से ग्रहण कर । ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार घर-द्वार और डेहरी-आँगन को उजियाला करने के लिए दीपक को क्रमश- द्वार और डेहरी में रखा जाता है । इससे घर के अन्दर और घर के बाहर साथ ही डेहरी और आँगने में भी उसका प्रकाश फैलता है । जो दीपक तेल-बाती या घी-बत्ती इत्यादि पर निर्भर रहता है, वह हवा पानी आदि कारणों से बुझ भी जाता है । यद्यपि विद्युत प्रकाश सामान्य हवा-पानी से तो नहीं बुझता, तथापि तेज आँधी, भारी वर्षा, त्रुटिपूर्ण विद्युत प्रवाह, तारों का संयोग-वियोग इत्यादि अनेक कारणों से यह भी बुझ जाता है । केवल मणि या फिर आत्मदीप ही एक ऐसा मणिदीप है जो कभी नहीं बुझता, क्योंकि यह स्वयं प्रकाशित होता है । इसमें कोई अन्य बाधक नहीं होता । चूँकि राम नाम धारण करने मात्र से ज्ञानदीप के माध्यम से ब्रह्माग्नि प्रज्वलित हो जाता है और ब्रहामाग्नि प्रज्वलित हो जाने से साधक ब्रह्ममय हो जाता है, इसलिए तू केवल रामनाम को जीभ में रख । “पुरम्, एकादशद्वारम्” (श्रुति ) के अनुसार इस देहरूपी पुरी के एकादश द्वार हैं । दस द्वार तो सर्वविदितहैं । ग्यारहवाँ द्वार नाभि को माना गया है । ग्यारह द्वार से युक्त देहपुरी का जो पुरद्वार है, जो सबसे बड़ा होता है , वह है मुख । जिस प्रकार घर (आँगन-देहरी) द्वरा का संयोग है ठीक उसी प्रकार शरीरांग और एकादश द्वार का संयोग है । जैसे – दीया, तेल, बाती और लौ, ठीक वैसे ही मुँह, लार, जीभ और रामनाममणि । मूँहरूपी दीया, लार रूपी तेल, जीभरूपी बाती और रामनाममणि रूपी लौ । अतएव इसी जीभरूपी बत्ती में रामनाममणि रूपी टेम को प्रज्वलित कर, जो कभी न बुझे, जो कभी न अटके । नाममणि जीभ पर निरन्तर बना रहे । जिस प्रकार दीपक की लौ अथवा प्रकाश को घर अन्दर-बाहर, दहलीज-आँगन इत्यादि कहीं भी ले जा सकते हैं ठीक इसी प्रकार जीभ में रखकर इस नाममणि को कहीं भी ले जा सकते हैं । जिस प्रकार दीपक की लौ व्यक्ति के किसी भी कार्य में बाधक नहीं होता, ठीक उसी प्रकार नाममणि भी व्यक्ति के कीसी भी गार्य में बाधक नहीं होता । इसका आशय यह है कि नाममणि साधक का सहायक ही नहीं अपितु प्रेरक भी होता है । इसलिए ध्यान रहे कि नाममणि की ज्योति सदा जलती रहे । यह ध्यान रहे कि श्री गोस्वामीजी ने यहाँ पर नामि वंदना, नाम जपना और नाम स्मरण इत्यादि नहिं लिखा है । केवल नाम धरु लिखा है । इस कारण तू केवल इस मणि को ही जीभ में रख, ग्रहण कर या फिर धारण कर । इस प्रक्रिया में होंट को हिलाने और जीभ को डुलाने की आवश्यकता नहीं होती है । यह जब बिना जपे ही होता रहता है। वह मंत्र जो बिना जपे अथवा बिना यत्न के जपा जा सके, स्वाभाविक अथवा श्वासोच्छ्वास को ‘अजपाजप’ या ‘हंस मंत्र’ कहा गया है । हं = श्वास खींचना, स = श्वास छोड़ना । शरीर के रोम-रोम से यह जप स्वाभाविक रूप से श्वास के आने-जाने के साथ ही होता रहता है । यह जप श्वास निरोध के साथ भी होता रहता है । नाथ सम्प्रदाय की साधना में भी इसे अजपाजप ही कहा गया है । सिद्ध साहित्य में इसे व्रज्रजप के नाम से मान्य किया गया है । संत साधना में इसे सहजजप कहा गया है । इससे मन स्थिर हो जाता है । यह एक श्रेष्ठ व्रत है। इससे अनुपम ज्ञान की उपलब्धि होती है। “भाई मेरे निहधन को धन राम । रामनाम मेरे हृदय में राखूं ज्यूं लोभी राखे दाम ।। दिन-दिन सूरज सवायो उगे, घटत न एक छदाम । सूरदास केइतनी पूँजी, रतन मणि से नहीं काम ।।” संत चूज़ामणि बाबा सूरदास लिखते हैं कि मुजे रत्नाभूषण, हीरा-मोती, माणिक्य-मणियों से कोई काम नहीं । ये सब मेरे लिए निरर्थक हैं, पत्थर के टुकड़ों के समान हैं । हे माता ! मुझ निर्धन केलिए तो धन केवल श्रीराम नाम है । मैं इस परम धन रामनाम को अपने हृदय में रखता हूँ । जैसे – लोभी और कंजूस व्यक्ति अपने भण्डार में धनराशि को रखता है। ध्यान रहे ग्रहराज सूर्य केवल वक्री नहीं होते, इतनी ही बात नहीं है वे कभी स्थिर भी नहीं होते, यह बात प्रमुख है । केवल मार्गी ही रहते हैं, चलायमान या फिर गतिमान ही रहते हैं । वे कभी अस्त नहीं होते । वे सदा प्रकाशित रहते हैं । प्रज्वलित रहते हैं । उगे रहतेहैं । वे कभी न्यून नहीं होते, कभी हीन नहीं होते, कभी घटते नहीं । वे बाबा सूरदास के शब्दों में दिनोंदिन लगभग सवा गुना अधिक प्रकाशित होते हैं । वे पैसे के चतुर्थांश अथवा पैसे का चौथाई भाग भी नहीं घटते । इसी प्रकार रामनाम का प्रभा भी कभी नहीं घटता । दूसरे शब्दों में रामनाम का प्रभाव सदा बढ़ोत्तरी की ओर ही अग्रसर रहता है। कृपण अपने धन का उपभोग न तो स्वयं करता है और न अन्यों को करने देता है, कितु रामनामधारी स्वयं तो प्रकाशित होते ही हैं, साथ-साथ सत्संग में रहने वाले अन्य साथी को भी प्रकाशित करते हैं । इसी कारण मैं अपने हृदय भण्डार में रतन मणि को नहीं, अपितु रामनाममणि को ही संबालकर रखता हूँ । मेरी इतनी ही पूँजी है । “कबीरा सब जग निर्धना धनवन्ता नहीं कोय । धनवन्ता सोई जानिये जाके राम नाम धन होय ।।” इसलिए रामनाम धर कर, धारण कर, ग्रहण कर अथवा ले-ले कर, धनधान्य हो जाओ, चलते-फिरते, उठते-बैठते, सोते-जागते प्रत्येक समय राम-राम-राम-राम राम-राम व्रज्रजप, सहजजप, हंसजप, अजपाजप जपा करो । हिरण्यगर्भ at 10:45 AM Share No comments: Post a Comment ‹ › Home View web version Powered by Blogger.

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