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ब्रम्ह सत्यं जगन्मिथ्या
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ब्रम्ह सत्यं जगन्मिथ्या....
Submitted by Ajay Tripathi on Thu, 09/26/2013 - 11:00
जब आप कोई सपना देखते हैं तो उस हाल में वह संसार झूठ नहीं लगता । लेकिन सपना टूटते ही वह झूठा या मिथ्या हो जाता है। तो फिर सच क्या है? सपने का संसार या सपने के बाहर का? यह कैसे तय हो कि सपना क्या है? क्या पता जिस संसार का अनुभव हमें हो रहा है, वह भी एक सपना हो ? उस सपने के टूटते ही किसी और जगत का अनुभव हो। किसी जगत की खोज में कई दार्शनिक सिद्धांत आए । वेदों मे ंवर्णित कर्मकांडों और देवताओं से जब जिज्ञासा शांत नहीं हुई, तो उपनिषदों की रचना हुई । उसमें कई गूढ़ प्रश्नों के समाधान ढूंढने की कोशिश की गई। उस दौरान जो निष्कष साने आए उन्हं सुरक्षित रखने के लिये सूत्रों की रचना हुई। उन सूत्रों को कंठस्थ करने में सुविधा हुई।
शंकराचार्य के ग्रंथ भाष्य ग्रंथ ब्रह्मासूत्र भगवद्गीता उपनिषद माडूक्यकारिका विष्णुसहस्रनाम सनतमुजातीय आपस्तंभ धर्मपटल स्तोत्र ग्रंथ शिव स्तोत्र विष्णु स्तोत्र देवी स्तोत्र, गणेश स्तोत्र, हनुमत पंचरत्न स्तोत्र, युगल देवता स्तोत्र, नदी तीथर्ई विषय स्तोत्र, प्रकरण ग्रंथ अद्वैत पंचरत्न अद्वैतानुभूति आत्मबोध उपदेशसहस्री चरपटपंजरिका निर्गुण मानसपूजा निर्वाणमंजरी पंचीकरम विवेक चूड़ामणि तत्वबोध योगतारावली सर्ववेदांत सिद्धांत सार बादरायण का ब्रह्मसूत्र ऐसे ही सूत्रों का संकलन है । लेकिन ये सूत्र इतने सारगर्भित है कि उन्हें समझ पाना आसान नहीं। सूत्रों की व्याख्या के लिए ब्रह्मसूत्र पर कई भाष्य लिखे गए। शंकर रामानुज, मध्व, वल्लभ और निंबार्क ने अपने अपने ढंग से उनकी व्याख्या करने की कोशिश की। लेकिन शंकराचार्य ने भारतीय चिंतन को एक ऐसे मुकाम पर पहुंचा दिया जहां चिंतन की सभी धाराएं आ कर लुप्त हो जाती है। विदेशों में तो उनके अद्वैत वेदांत को भारतीय चिंतन का प्रतिनिधि माना जाता है।शंकर ने उपनिषदों के तमाम दार्शनिक सिद्दांतों को एक सूत्र में पिरोया और अपने मत का प्रतिपादन किया। उनके अनुसार इस सृष्टि में ब्रहम ही सत्य है। संसार माया है। इसीलिए मिथ्या है। जीव यानी आत्मा और ब्रह्म में कोई फर्क नहीं है। पश्चिमी विचारकों ने भी विज्ञान और गणित पर आधारित होने के बावजूद संसार के मिथ्यात्व की ओर संकेत किया? डेकार्ट भी संसार के अस्तित्वको साबित नहीं कर पाते है।
उनके अनुसार एक ऐसा तत्व है जो जागने और सोने की दोनों स्थितियों में मौजूद रहता है। उन्होंने अपनी भाषा में सिद्धांत दिया कोजिटो अर्गो सम । आइ थिंक सो दैट आइ एम। यानी मैं सोचता हूं इसलिए मैं हू। इस तत्व को डेकार्ट ने आत्मा कहा। इसी आत्मा को शंकर ने जीव कहा है, जो ब्रह्मा से अभिन्न है । ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या जीवो ब्रम्हौव नापर: । यानी ब्रह्मा सत्य है, जगत मिथ्या और जीव ही ब्र्हम है। ब्र्हम से जीव को इसी अभिन्नता के कारण उनके सिद्धांत को अद्वैतवाद कहा गया । उनके अनुसार सता दो नहीं, अद्वैत है। भगवान और भक्त में कोई द्वैत नहीं । उस द्वैत या अलगाव की वजह माया है।
हम जिस संसार को अपनी आंखो ंसे देखते हैं उसे शंकर ने एक वाक्य में नकार दिया। आश्चर्य की बात नहीं है कि इस विचार को समाज की स्वीकृति भी मिल गई। आम आदमी भले ही शंकराचार्य के मायावाद स्दिधांत से वाकिफ न हो, लेकिन संसार के बारे में यह कहावत काफी प्रसिद्ध है कि सब माया का खेल है। गोस्वामी तुलसीदास ने मानस में लिखा भी हैकि माया महाठगिनी हम जानी।
शंकराचार्य के दर्शन पर तमाम सवाल उठाये गये कि संसार मिथ्या कैसे हो सकता है ? तब शंकर ने अपने मायावाद के सिद्धां से उनका जवाब दिया। मायावाद के अनुसार ब्रह्मा के अलावा जो कुछ भी है वह माया है। माया ब्रह्मा की ही शक्ति है । वह सत्य को ढंक लेती है । उसकी जगह पर किसी दूसरी चीज के होने का भ्रम पैदा कर देती है। मसलन रस्सी से सांप का भ्रम हो जाता है। माया भरह्म की शक्ति तो है, लेकिन ब्रह्म पर माया का प्रभाव नही ंपड़ता। ठीक जादूगर की तरह जो अपनी कला से दर्शकों को भ्रमित तो कर सकता है पर खुद भ्रमित नहीं होता। लेकिन अगर दर्शकों को जादू की बारीकियां बता दी जाए तो वह जादू के ुस खेल से भ्रमित नहीं होता। ऐसी स्थिति में जादूगर और दर्शक में कोई फर्क ही नहीं रह जाता। यह वही स्थिति है, जिसे शंकर कहते हैं कि ज्ञान हो जाने पर ब्रह्म और जीव में कोई भेद ही नही ंरह जाता ।
शंकर मानते हैं कि जीव को जब ज्ञान हो जाता है तब माया तिरोहित हो जाती है जैसे बादल छंट जाने के बाद सूर्य दिखाई पडऩे लगता है। उनके दर्शन पर आरोप लगाया गया कि वह वास्तविक जगत को सपना मान कर हमें जीवन को वास्तविकताओं से दूर हटा देता है। लेकिन ऐसा संकीर्ण सोच की वजह से है। शंकराचार्य ने तो जीवन को परम वास्तविकता से जोड़ दिया। उनके व्यावहारिक दृष्टिकोण में संसार और पारमार्थिक दृष्टिकोण में सन्यास की वास्तविकताएं मिलती है।
शंकराचार्य हमारे भौतिक जीवन का परिष्कार चाहते हैं। उसमें प्रेय और श्रेय दोनो ंएक दूसरे के पूरक बन जाते है और द्वंद्वों से मुक्ति दिलाते हैं। उनका वेदांत चिंतन के इतिहास में सबसे संगत अद्वैतवाद है। विलियम जेम्स के शब्दों में एक अद्वितीय परब्रह्मा, और मैं वह परब्रह्म । शंकर के दर्श में एक ऐसा धार्मिक विश्वास है जिसमें मन को संतुष्ट करे की असीम शक्ति है। सकंराचार्य कता दर्शन इतना व्यापक है कि उनके विचारों की संगति कई दर्शनों में हुई । यहां तक कि उन्हें प्रच्छत्र बौद्ध भी कह दिया गया । शंकर में कमाल की प्रतिभा थी। सिर्फ तीन साल की उम्र में उन्होंने मातृभाषा मलयाम सीख ली थी। पांच साल के हुए तो उन्हें अध्ययन के लिए गुरूकुल भेज दिया गया. दो सालों में ही उन्होंने सभी वेदों व शास्त्रों का अध्ययन कर लिया । आठ साल में मां की अनुमति ले कर सन्यास ले लिया। केरल के कलाडि गांव में 788 ई. में पैदा हुए शंकर घर छोड़ कर नर्मदा नदी के तट पर आए। उन्होंने गौड़पाद के शिष्य गोविंद योगी को अपना पहला गुरू बनाया । गुरू ने उन्हें परमहंस की उपाधि दी। गुरू के उपदेश से वह जल्द ही सिद्ध महात्मा बन गये। काशी पहुंच कर उन्होंने भगवान शंकर की आराधना की। और ज्ञान का प्रचार करने लगे।
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